|| इति ||

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देख! ये बीते दो क्षण फिर से ! देख! ये बीते फिर दो पल-छिन!
देख! प्रहर फिर बीता तुझ बिन, देख! प्रहार ये झेले गिन-गिन
देख! समय ये बीता जाए, देख! निकट हो अंत ये निशदिन
पल-पल, पल-पल, सोच ये बीते, कितना जीना और तेरे बिन
जीना कितना और तेरे बिन, मरना कितना और तेरे बिन!

..........पल वो क्षितिज* पर साथ जो जिया
..........रात ढल रही, भोर का दिया
..........भाग तब लिखा, ध्रुव* ने यों अटल
..........रात तुझको दी, दिन मुझे दिया
तबसे धूप ये तपती पल-पल, चढ़ता सूरज, ढलता ना दिन (cuz I was given daylight)
ना ही सवेरा, सांझ भी नहीं, अंतहीन ये बीते ना दिन
ताप की नहीं, त्याग की तपन, तपना कितना और तेरे बिन
पल-पल पल-पल जलता सोचे, जीना कितना और तेरे बिन
जीना कितना और तेरे बिन, मरना कितना और तेरे बिन!


..........आस ने मंथन मन का जो किया***
..........मोहिनी करामृत भी पी लिया
..........जीवन-घट जब निकला विषमय
..........घूँट-घूँट कर पात्र विष पिया
बूँद वो अमृत आयु बढाए, विष ये घटाए साँसे गिन-गिन
हर दिन घट में झांके ये मन, शेष हलाहल* कितना ले गिन
धीमे-धीमे अंत का चषक पीना कितना और तेरे बिन
मरना कितना और तेरे बिन, जीना कितना और तेरे बिन

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इति = अंत
क्षितिज = horizon
ध्रुव = Pole star. तारों से किस्मत लिखी होने की तुलना (Analogy). जिस तरह धृव तारा स्थिर है, वैसे ही भाग का लिखा अटल है, ऐसी तुलना
***सागर मंथन से तुलना की गई है, जिसमें से अमृत और विष दोनों निकले थे भगवान् विष्णु ने मोहिनी-अप्सरा का रूप लेकर देव तथा दानवों को अमृत बांटा था
करामृत = हाथों का अमृत
हलाहल=मंथन से निकला विष, deadly poison

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RC
1:00 am, 27 April 2009
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That Coffee

*‎ नर्म पड़ी थी धूप में सर्दी, गर्म पियाला ... कॉफी का तेरा मेरा सुख दुख बांटे, अपना रिश्ता... कॉफी का! * रूह, ख़ुदा, दिल-विल के मोड़ ...