Sunday, October 15, 2017

Gazal: मैंने सोचा सफर आख़री पड़ाव पर है

The Ocular Truth ... वि.... पश्यना 
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मैंने सोचा सफर आख़री पड़ाव पर है
लेकिन आगे कहीं राह फिर घुमाव पर है

इक-इक कर गिरह खोलीं कई हज़ार मैंने    
ये इक अंतिम हठीली किसी दबाव पर है         

कतरा क़तरा बदन का सुलग उठा अचानक
शायद कोई पुराना ज़ख्म रिसाव पर है।               

जन्मों के बीज, कर्मों के फेर, शून्य "रूपम"  
कब सोचा कि साँसों के रख-रखाव पर है

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मैंने सोचा सफर आख़री पड़ाव पर है
लेकिन आगे कहीं राह फिर घुमाव पर है .........


इक-इक कर गिरह खोलीं कई हज़ार मैंने    
ये इक अंतिम हठीली किसी दबाव पर है            ......... ( संखारा)

कतरा क़तरा बदन का सुलग उठा अचानक
शायद कोई पुराना ज़ख्म रिसाव पर है।                 ........ (संवेदनाएं )


जन्मों के बीज, कर्मों के फेर, शून्य "रूपम"  
कब सोचा कि साँसों के रख-रखाव पर है                    ..... (आनापान)

२२२२      १२२१    २१२१    २२

Sunday, April 30, 2017

कुछ तो हिसाबां बाक़ी है


अश्क में मय की झांकी है
आज-भी  ग़म ही  साक़ी है

सीने पर नक्काशी  है
इक-इक करके टांकी है

मोह नहीं अब यादों से
ले जाए ये जां की है

राहों में फिर, फिर मिलना .... 
...कुछ तो हिसाबां बाक़ी है 

April-May 2017
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