साधना Saadhna | Final

साधना



ज़ीना-ज़ीना गहरे उतरे दीवाने का अंत
अहमक़,आशिक़, अहमक़-मयकश, शायर,साधक, संत

मैं हूँ, मैं हूँ, मैं हूँ, मैं हूँ, कहता एक महंत
जब तक मुझमें "मैं" हूँ तब तक जनमूं जनम अनंत
(महंत =सन्यासी मठ का मुखिया)

दर्द अधूरा, इश्क़ अधूरा, तुझबिन आधा शब्द
जब तक पूरी ना हो जाऊं तब तक जन्म हलंत

बूंद बनी, बारिश, दरिया भी, फिर सहरा की रेत
अब मेरी मृगजल की बारी, चातक देत उदंत
(उदन्त= समाचार/किसी अंत तक पहुंचना)

"मेरा कोई रूप नहीं, मेरी सूरत मत पूज"
स्वप्न में रोज़ मिरे कहता है गेरू पहन भदंत
(भदंत =पूजित बौद्ध भिक्षु)


That Coffee

*‎ नर्म पड़ी थी धूप में सर्दी, गर्म पियाला ... कॉफी का तेरा मेरा सुख दुख बांटे, अपना रिश्ता... कॉफी का! * रूह, ख़ुदा, दिल-विल के मोड़ ...