Indradhanush इंद्रधनुष

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उठ जा पागल मनवा मोरे जमघट नदी के तीर से
मन का  मैला कब निकला है धो धो नदी के नीर से
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राजाओं ने त्याग दिया सुख क्यों बन गए फ़क़ीर से   
बुझती नहीं  वो प्यास खीर से जो बुझती है नीर से
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छुप जाएं अपराध जगत से छुप न पाये ज़मीर से
सूर्य छिपाया बादल पीछे चांदी बनी लकीर से (silver lining)
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*चन्द्रकिरण में इक तन शीतल दूजा जले शरीर से
  इक भीगे मधुचन्द्र की आंच से... इक पूनम के क्षीर से
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जौन-कुमार से  प्रेरित तुम मैं मीरा मीर कबीर से
कामुकदेव से घायल तुम मैं इंद्रधनुष  के तीर से
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That Coffee

*‎ नर्म पड़ी थी धूप में सर्दी, गर्म पियाला ... कॉफी का तेरा मेरा सुख दुख बांटे, अपना रिश्ता... कॉफी का! * रूह, ख़ुदा, दिल-विल के मोड़ ...