That Coffee



*‎
नर्म पड़ी थी धूप में सर्दी, गर्म पियाला ... कॉफी का
तेरा मेरा सुख दुख बांटे, अपना रिश्ता... कॉफी का!
*
रूह, ख़ुदा, दिल-विल के मोड़ नही आये थे राहों में
पहला लम्स जनम का बन्धन, सीधा नाता ... कॉफी का
*
एक उमीद रही है बाक़ी, एक सहारा जीने का
एक हवाला वादा तेरा, वादा तेरा.. कॉफी का
*
दुनिया भर का इश्क़ निचोड पड़ा था टेबल पर तनहा
लाली थी कोरे पर, आधा कप था छोड़ा .. कॉफी का
*
जाने क्यों टूटे दिल वाले काली कॉफी पीते हैं?
इश्क़ मिठास रही ना बाक़ी... कड़वा प्याला कॉफ़ी का
*
सर्द था मौसम, बेकाबू मन, उसपर  कम्पन हाथों का
होंठों पर दस दिन लेकर मैं घूमा, छाला कॉफी का
*
उसके कप से कॉफी पीना खुशफहमी का बोसा था
उसके लब का जाम मिला कर जाम बनाना कॉफी का
*
उसके जाने पर मुझको ज़हरों ने ज़िन्दा रखा है
एक सहारा सिगरेट का.. और एक है साला! कॉफी का
*
होश-हवास शिथिल क्यों है, क्या आज समाअत धीमी है?
रंग, लम्स, रस, गन्ध, जगें.. लो नाम दुबारा कॉफी का!
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2222  2222  2222  222
*क्या होता है कोई स्त्री मन जब भक्ति में झुकता है
लिपस्टिक चिपचिप लगती है और काजल भारी लगता है

* जब जब मन करता है तोड़ दूं आज तो सारे बन्धन ही
सामाजिक जीवन है ज़रूरी कह कह मन ही ठगता है

* पेशे में रोबाट^ बना कर लाभ दिया, बेकारी भी
एक हथेली दाना छीने दूजे पंछी चुगता है

* नींद में जब अवचेतन जागे स्वप्न उसे तुम कहते हो
आँख खुले तो असली जीवन दिवास्वप्न-सा लगता है

* दिल जो कभी बेवफ़ा पे रोता, तन्हाई से डरता था
आज वही दिल धम्मशिविर दस दस दिन तनहा रहता है


•मैं तपता मिट्टी का बर्तन, मुझमें तेल था मिट्टी का
तन कौटुम्बिक और मन मेरा बैरागी होता जाता है
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(^  --Robotics as my profession)
(*धम्मशिविर : विपश्यना साधना जहाँ 10 दिन अकेले और मौन में रहना पड़ता है)

ग़ज़ल

1. अदाएं, शोख़ी, हँसी लबों पे, गुलों सी खुलती है नाज़नीं पे
निगाह नीची, लबों को भीचे, हया की शबनम भी है जबीं पे
.......
2.जुदाई का दिन ज़हर-जहर और थी रात जैसे कहर जमीं पे
शिकन-शिकन है रिदा और आंसू निशान सूखे हैं आसतीं पे
....
3. वो ख़ाब होगा ख़ुदा ने माथे से नाम उसका मिटा दिया है
उनींद आंखें अभी भी हैं और हैं  सिलवटें भी अभी जबीं पे
....

Dilemma | Tere jeevan ki soochi me

Dilemma
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तेरे जीवन की सूची में
मैं अग्र या अंत? चलन ना कर
         मैं तेरा अवचेतन इश्क़ हूँ
         इश्क़ में इतने जतन ना कर

ये प्रेम की पूँजी बाँट बढे
सीमाएं इतनी सघन ना कर
         जो हक़ है तो, बिन मांगे दे
         मुझे भीख में दे, निर्धन ना कर

व्यवहारी हो और, इश्क़ भी हो
इतना भी संतुलन ना कर
        मैं हूँ तो हूँ, मैं नहीं तो नहीं
        मैं विकल्प नहीं, तू चयन ना कर.

तेरे अधिमान कि दुविधा गर
मैं हूँ तो तू चिंतन ना कर
       गर मैं ही नहीं, तो विकल्प नहीं
       आसान गणित है। कठिन ना कर!

   
अवचेतन -sub-conscious
विकल्प - option

चयन - choose, select
अधिमान - preferences

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April 8, 2014
Philadelphila
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|| इति ||

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देख! ये बीते दो क्षण फिर से ! देख! ये बीते फिर दो पल-छिन!
देख! प्रहर फिर बीता तुझ बिन, देख! प्रहार ये झेले गिन-गिन
देख! समय ये बीता जाए, देख! निकट हो अंत ये निशदिन
पल-पल, पल-पल, सोच ये बीते, कितना जीना और तेरे बिन
जीना कितना और तेरे बिन, मरना कितना और तेरे बिन!

..........पल वो क्षितिज* पर साथ जो जिया
..........रात ढल रही, भोर का दिया
..........भाग तब लिखा, ध्रुव* ने यों अटल
..........रात तुझको दी, दिन मुझे दिया
तबसे धूप ये तपती पल-पल, चढ़ता सूरज, ढलता ना दिन (cuz I was given daylight)
ना ही सवेरा, सांझ भी नहीं, अंतहीन ये बीते ना दिन
ताप की नहीं, त्याग की तपन, तपना कितना और तेरे बिन
पल-पल पल-पल जलता सोचे, जीना कितना और तेरे बिन
जीना कितना और तेरे बिन, मरना कितना और तेरे बिन!


..........आस ने मंथन मन का जो किया***
..........मोहिनी करामृत भी पी लिया
..........जीवन-घट जब निकला विषमय
..........घूँट-घूँट कर पात्र विष पिया
बूँद वो अमृत आयु बढाए, विष ये घटाए साँसे गिन-गिन
हर दिन घट में झांके ये मन, शेष हलाहल* कितना ले गिन
धीमे-धीमे अंत का चषक पीना कितना और तेरे बिन
मरना कितना और तेरे बिन, जीना कितना और तेरे बिन

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इति = अंत
क्षितिज = horizon
ध्रुव = Pole star. तारों से किस्मत लिखी होने की तुलना (Analogy). जिस तरह धृव तारा स्थिर है, वैसे ही भाग का लिखा अटल है, ऐसी तुलना
***सागर मंथन से तुलना की गई है, जिसमें से अमृत और विष दोनों निकले थे भगवान् विष्णु ने मोहिनी-अप्सरा का रूप लेकर देव तथा दानवों को अमृत बांटा था
करामृत = हाथों का अमृत
हलाहल=मंथन से निकला विष, deadly poison

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RC
1:00 am, 27 April 2009
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फासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा न था"
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• ज़िन्दगी! अब दे इजाज़त, क़र्ज़ तेरा भर चुकी
इश्क़ भी मैं, वस्ल भी मैं, हिज्र भी मैं सह चुकी

• राह-उल्फत ले गयी है 'जान' से यूँ 'जाम' तक
तख़्त भी मैं, तर्स भी मैं, तल्ख़ भी मैं तर चुकी

• धूप था वह भाद का, और झील मैं सावन की थी
अक्स भी मैं, अस्ल भी मैं, अश्क भी मैं बन चुकी

• ऐ सितमगर! दे बता अब तो नतीजा इश्क़ का
फ़िक्र भी मैं, अर्ज़ भी मैं, सब्र भी मैं कर चुकी

• कौंध बिजली सी, बनी तूफाँ मैं बरसी, थम चुकी
रश्क भी मैं, रक्स भी मैं, रंज भी मैं कर चुकी

• ऐ ख़ुदा, हक़ चैन का अब बेवफा को हो अता
मर्ज़ भी मैं, दर्द भी मैं, हश्र भी मैं सह चुकी

• तू तसव्वुर, इश्क़ तू, तुझसे मुक़म्मल है ग़ज़ल
हर्फ़ भी मैं, लफ्ज़ भी मैं, वज़्न भी मैं बन चुकी
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ज़िन्दगी! अब दे इजाज़त, क़र्ज़ तेरा भर चुकी
इश्क़ भी मैं, वस्ल भी मैं, हिज्र भी मैं सह चुकी

राह-उल्फत ले गयी है 'जान' से यूँ 'जाम' तक
तख़्त भी मैं, तर्स भी मैं, तल्ख़ भी मैं तर चुकी
(Jaam is bitter, talkh,
Jaan se jaam = takht to talkh = falling top to bottom)

धूप था वह भाद का, और मैं थी सावन झील सी
अक्स भी मैं, अस्ल भी मैं, अश्क भी मैं बन चुकी
(He was like the scorching sun of Bhadrapad. I was like a pond formed in Saavan. In the heat, I have become his reflection aka Aks, shown the truth aka Asl, and was also evaporated to droplets, like अश्क़)

ऐ सितमगर! दे बता अब तो नतीजा इश्क़ का
फ़िक्र भी मैं, अर्ज़ भी मैं, सब्र भी मैं कर चुकी


कौंध बिजली सी, बनी तूफाँ मैं बरसी, थम चुकी
रश्क भी मैं, रक्स भी मैं, रंज भी मैं कर चुकी
(Bijli~ Rashq/jealousy, Toofan/ Storm~~ dance or Raks, rain and silence~ grief, sandness, Ranj)

ऐ ख़ुदा, हक़ चैन का अब बेवफा को हो अता
मर्ज़ भी मैं, दर्द भी मैं, हश्र भी मैं सह चुकी  
(If relief from betrayal is a like healing from disease, then the treatment-pain-affect all have been done, so please grant him the relief)

तू तसव्वुर, इश्क़ तू, तुझसे मुक़म्मल है ग़ज़ल
हर्फ़ भी मैं, लफ्ज़ भी मैं, वज़्न भी मैं बन चुकी

(I have been the words, letters, rules and everything of this Ghazal but it is incomplete because it is only you who completes it)

Indradhanush इंद्रधनुष

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उठ जा पागल मनवा मोरे जमघट नदी के तीर से
मन का  मैला कब निकला है धो धो नदी के नीर से
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राजाओं ने त्याग दिया सुख क्यों बन गए फ़क़ीर से   
बुझती नहीं  वो प्यास खीर से जो बुझती है नीर से
.......
छुप जाएं अपराध जगत से छुप न पाये ज़मीर से
सूर्य छिपाया बादल पीछे चांदी बनी लकीर से (silver lining)
........
*चन्द्रकिरण में इक तन शीतल दूजा जले शरीर से
  इक भीगे मधुचन्द्र की आंच से... इक पूनम के क्षीर से
......
जौन-कुमार से  प्रेरित तुम मैं मीरा मीर कबीर से
कामुकदेव से घायल तुम मैं इंद्रधनुष  के तीर से
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Honth fatane lag gaye

2122   212
वार  थमने लग गए
हाथ दुखने लग गए
       बात इतनी सर्द थी
       होंठ फटने लग गए
देख कलयुग सो गया
लोग जगने लग गए
      राज़ ढकने के लिए
      राख ढकने लग गए
यूँ गहन थी वो कशिश
स्पर्श जलने लग गए
      क़ान ना ढक पाए जब
      चीख सहने लग गए
लाख दी चेतावनी
इश्क़ करने लग गए
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Sep 15 2018
10 pm
Gurgaon
B 12 suncity

Paradigm Shift वो खूँखार शेर

=====The Paradigm Shift  ==========
शेरों की दहाड़ गूंज वादी में है
सब हिरनों की जान आज आधी में है
        छौने पर नज़र गड़ी है शेर की इकटक
        माँ का ध्यान भूख, जल, इत्यादि में है
भूख लगे तो वार, है नियम जंगल का
 ये भी एहतिराम उस जिहादी में है
         पहली बार क्रूर को दया आयी है
         पापों का अंत ऐसे ही आदी में है
लौटा जो शिकार बिन गुफा में भूखा
वो खूंखार शेर अब समाधी में है
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बिजूका bijooka

22 12  12 22  2
सपने चिराग में रखते हैं
ताबीर आग़ में रखते हैं

अंगार की एक कहानी
छोटेसे दाग़ में रखते हैं

दौरे-जहां में एक बिजूका
परियों के बाग़ में रखते हैं

किस किस विकल्प से  क्या होगा
मेनू दिमाग़ में रखते हैं

हम तेल लंबी रातों के
गहरे चिराग़ में रखते हैं

साधना
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जितना बिस्तर उतनी चादर
सुख दुख सारा एक बराबर

पाप किये बिन सुख का भोग भी
भरता है कर्मों की गागर

सारी रात गुनाह गिनाता
एक ज़मीर-ब-नाम निशाचर

जग सारा मर्कट मन चंचल
इक हनुमान ज्ञान गुण सागर

अंतर्द्वंद्व में हार गया मैं
Yoda जैसा एक बहादर

कविता से कब मोक्ष मिलेगा
रूपम, बैठो ध्यान लगाकर

That Coffee

*‎ नर्म पड़ी थी धूप में सर्दी, गर्म पियाला ... कॉफी का तेरा मेरा सुख दुख बांटे, अपना रिश्ता... कॉफी का! * रूह, ख़ुदा, दिल-विल के मोड़ ...