Sunday, October 15, 2017

मैंने सोचा सफर आख़री पड़ाव पर है

The Ocular Truth ... वि.... पश्यना 
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मैंने सोचा सफर आख़री पड़ाव पर है
लेकिन आगे कहीं राह फिर घुमाव पर है

इक-इक कर गिरह खोलीं कई हज़ार मैंने    
ये इक अंतिम हठीली किसी दबाव पर है         

कतरा क़तरा बदन का सुलग उठा अचानक
शायद कोई पुराना ज़ख्म रिसाव पर है।               

जन्मों के बीज, कर्मों के फेर, शून्य "रूपम"  
कब सोचा कि साँसों के रख-रखाव पर है

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मैंने सोचा सफर आख़री पड़ाव पर है
लेकिन आगे कहीं राह फिर घुमाव पर है .........

इक-इक कर गिरह खोलीं कई हज़ार मैंने    
ये इक अंतिम हठीली किसी दबाव पर है            ......... ( संखारा)

कतरा क़तरा बदन का सुलग उठा अचानक
शायद कोई पुराना ज़ख्म रिसाव पर है।                 ........ (संवेदनाएं )

जन्मों के बीज, कर्मों के फेर, शून्य "रूपम"  
कब सोचा कि साँसों के रख-रखाव पर है                    ..... (आनापान)

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